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शंख ध्वनि घंटा नाद का रहस्य

क्यों होते है मंदिरों में शंख ध्वनि घंटा नाद?

किसी मंदिर में खडें होने पर परम शांति का अनुभव भी हमें इसलिए होता है. अत: घरों में नित्य किसी न किसी शंख ध्वनि घंटा नाद मंत्र का व्यवस्थित नाद अवश्य उत्पन्न किया जाना चाहिए. साथ ही संभव हो टी घंटी इत्यादि बजाकर नित्य हमें देवाराधना करनी चाहिए. यहाँ यह एक विशिष्ट तथ्य है कि मंदिरों में बजाये जाने वाले घंटे कुछ विशिष्ट घातुओं के संतुलित मिश्रित होते है, जिनसे विशिष्ट प्रकार के कम्पन्न होते है.  ये कम्पन्न सूक्ष्म हानिकारक जीवों को पूर्णत: नष्ट करने में सक्षम होते है.

हमारे देश में प्राचीन काल से मन्दिरों में शंख ध्वनि घंटा नाद किया जाता है. जब हम किसी मंदिरों में प्रवेश करते है, तब घंटा नाद और शंख ध्वनी का सम्बंध आरती से मान लिया जाता है, परन्तु यह तथ्यपूर्ण नहीं है.

ज्ञातव्य है कि समय से ही हमारे ऋषि मुनि इस तथ्य से भालीभाती परिचित थे कि जब किसी स्थान पर जन समूह एकचित्र होगा, तो प्रदूषण फेलेगा. इन विभिन्न प्रकार के लोगो के साथ अनेक प्रकार के रोगों के जीवाणु भी फैलते है, जिनमे संक्रामक रोगों के फेलने की सम्भावना है. इन संक्रामक बीमारियों से बचाव के लिए ध्वनी तरंगो में विभिन्न प्रकार की बीमारियों के किटाणुओं को नष्ट करने की अद्भुत क्षमता होती है.

 

यह एक बेज्ञानिक रूप से सिद्ध किया हुआ तथ्य है कि पुलों के ऊपर चलते समय सेना को मार्च नहीं करने दिया जाता है अथवा पुल पर बाज नहीं बजाये जाते. कारण यह है कि इसके परिणामस्वरूप कम्पन्न कुछ इस प्रकार के होते है. कि उनसे पुल टूट सकता है, उसे क्षति पहुँच सकती है. कहने का तात्पर्य यह है कि संयमित एवं नियमित नाद अथवा कंपन्न आवृत्तियों परम शक्तिशाली होती है.

ठीक इसी प्रकार मंत्रों के उच्चारण से निकलने वाले अनुवाद अथवा कम्पन्न हमारे शरीर पर विशिष्ट प्रभाव डालते है. यही कारण है कि मंत्र विशेष का व्यवस्थित उच्चारण करने हमें सम्बंधित कार्य में अथवा ग्रह विशेष की पीड़ा हरने में सहायता मिलती है. यही बात मंदिरों से बजने वाले घंटों के नाद पर भी लागू होती है.

मंदिरों में अन्दर अथवा प्रवेशद्वार पर लगे हुए शंख ध्वनि घंटा नाद को कंपित करने (बजाने) के पीछे भी यही प्रयोजन है, ताकि उसके अनुनाद से वहाँ का वातावरण सदैव धनात्मक ऊर्जा से युक्त रहे. मंदिरों में सदैव घंटों का नाद मन्त्रोंउच्चारों के स्वर इत्यादि, वहाँ के वातावरण को परम दिव्यता प्रदान करते है. यह सर्वविदित है.

 

किसी मंदिर खड़े होने पर परम शांति का अनुभव भी हमें इसलिए होता है. अत: घरों में नित्य किसी न किसी मंत्र का व्यवस्थित नाद अवश्य उत्पन्न किया जाना चाहिए. साथ ही सम्भव हो तो घंटी इत्यादि बजाकर नित्य हमें देवाराधना करनी चाहिए. यहाँ यह एक विशिष्ट तथ्य है कि मंदिरों में बजाये जाने वाले घंटे कुछ विशिष्ट घातुओं के संतुलित मिश्रण होते है. जिनसे विशिष्ट प्रकार के कम्पन्न होते है. ये कम्पन्न सूक्ष्म हानिकारक जीवों को पूर्णत: नष्ट करने में सक्षम होते है. इनके सतत कम्पनो से वातावरण में धनायान नष्ट होते है, परिणाम स्वरूप ऋणायनों की वृद्धि होती है.

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